Saturday, November 11, 2006

Muslim's Rights in Islam


मुसलमानों के हूक़ूक
कुरआन शरीफ और हदीस में हर मुसलमान के लिए कुछ हक़ मुकर्रर किए है जिन्हें अपनाना हर मुसलमान पर फर्ज है।
1. मुलाक़ात के वक्त सबसे पहले सलाम करे।
2. किसी शराबी, जुआरी, काफिर, मशरिक आदि से सलाम करना मना किया गया है, जब कोई मुस्लिम इनसे सलाम करता है तो हदीस में है कि गजब-ए-इलाही से अर्श कांप जाता है क्योंकि सलाम करना ताजिम है और इनमें से कोई ताज़िम के लायक नहीं।
3. सलाम करना सुन्नत और उसका जवाब देना वाजिब है।
4. अगर अपने अज़ीज़ या रिश्तेदार मुफलिस हो, या खाने कमाने की ताक़त ना रखते हो तो अपनी माली हालत के मुताबिक़ उनकी मदद करते रहे।
5. मुसलमानो की नमाज़े जनाज़ा और उनके दफन में शरीक हो।
6. रिश्तेदारों से मिलते जुलते रहना, उनके खुशी और ग़म में शरीक़ होना सुन्नते रसूल है।
7. मुसलमानों की दावत को क़बुल करे।
8. लोगों को उनके व्यवहार (अख़्लाक) के अनुसार बुरे कामों से रोके।
9. तीन दिन से ज्यादा किसी मुसलमान से व्यवहार बंद ना करे।
10. मुसलमानों का आपस में झगड़ा हो जाये तो उनके बीच सुलह कराना सुन्नत है।
11. किसी को जानी व माली नुकसान न पहुंचाएं।
12. जो बात अपने लिए पसंद करे वहीं दूसरे मुसलमानों के लिए भी पसंद करे।
13. रास्ता भुले हुए को सीधा रास्ता दिखाए।
14. किसी को लोगों के सामने ज़लील व रुसवा ना करे।

आम इन्सानों के हूकूक
मुसलमानों के कुछ ऐसे अधिकार है जो हर इन्सान के लिए है चाहे वह किसी भी समाज या धर्म से संबंध रखता हो।
1. बिना किसी वजह के किसी को भी जानी व माली नुकसान न पहुंचाए।
2. बिना किसी शरई वजह के किसी के साथ भी बद्तमिजी , बहस ना करे।
3. बीमार का इलाज कराना, भुखे को खाना खिलाना, मुसिबत में किसी की मदद करना इन्सानी फर्ज है।
4. किसी को सज़ा देने या लड़ाईयों में शरीअत ने जो हद दी उनसे ज्यादा ना बढ़े। ये शरीअते इस्लाम की मुकदस तालीम से हर इन्सान का हर इन्सान पर हक़ है। हदीस में हे कि 'रहम करने वालों पर रहमान रहम करता है तुम लोग ज़मीन वालों पर रहम करों तो आसमान वाला तुम पर रहम करेगा'।
5. सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फरमाया है कि तमाम दुनिया में वो शख्स अल्लाह के नज़दीक होगा जो उसकी मख्लुक (दुनिया में रहने वाले) के साथ अच्छा सलुक करे।

Saturday, November 04, 2006

Husband's Rights in Islam

बेहतरीन शौहर वो है जो
* जो अपनी बीवी के साथ नरमी, खुशदिली और मुहब्बत के साथ पेश आए।
* जो अपनी बीवी के हक़ अदा करने में किसी प्रकार की कोताही ना करे।
* जो अपनी बीवी का इस तरह हो कर रहे कि किसी अजनबी औरत पर निगाह न डाले।
* जो अपनी बीवी को अपने ऐश व आराम में बराबर की शरीक समझे।
* जो अपनी बीवी पर किसी तरह का जुल्म या ज्यादती ना करें।
* जो बीवी की बद्अख्लाकी पर सबर करें।
* जो अपनी बीवी की खूबियों पर नज़र रखे, और गलतियों को नज़रअन्दाज कर दे।
* जो बीवी की मुसिबतों, बीमारियों, रंज व ग़म में उसका भरपूर साथ दे।
* जो अपनी बीवी को परदे में रखकर उसकी हिफाजत करें।
* जो दीनदारी की ताकीद करता रहे और शरीअत की राह पर चलाए।
* जो बीवी को अपनी मेहनत की कमाई खिलाएं।
* जो बीवी के साथ साथ उसके खानदान के साथ भी अच्छा सलुक करे।
* अपनी बीवी के सामने किसी दूसरी औरत की खुबसूरती की तारीफ न करे।
* जो बीवी को इस तरह कन्ट्रोल रखे कि वह किसी बुराई की तरफ रुख नही करे।
* जो अपनी बीवी पर एतमाद व भरोसा रखे।

बेहतरीन बीवी की पहचान ये है कि

* जो अपने शौहर के सभी अधिकार पुरे करने में कोताही न करे।
* जो अपने शौहर की खूबियों पर नज़र रखे और खामियों को नज़र अन्दाज़ करे।
* जो शौहर की फरमाबरदारी और खिदमत गुज़ारी को अपना फर्ज समझे।
* जो खुद तकलीफ उठा कर अपने शौहर को आराम पहुंचाने की हमेशा कोशिश करती रहे।
* जो शौहर की आमदनी से ज्यादा खर्च ना करे।
* जो शौहर के सिवा किसी अजनबी पर निगाह ना डाले।
* जो परदे में रहे।
* शौहर के माल, सामान मकान और खुद अपने आपको शौहर की अमानत समझकर उनकी हिफाजत और निगाहबानी करे।
* शौहर को मुसिबत में अपनी जानी व माली कुर्बानी के साथ वफादारी से साथ दे।
* जो शौहर की ज्यादती और जुल्म पर हमेशा सब्र करती रहे।
* जो मज़हब की पाबन्द और दीनदार हो।

Wive's Rights in Islam

बीवी के हक़ शौहर पर

इस्लाम ने औरतों पर अपने शौहर के लिए कुछ नियम बनाये जिनका सख्ती से पालन करना बीवियों के लिए फर्ज हैं। रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फरमाया कि अगर मैं खुदा के अलावा किसी ओर को सज़्दा करने का हुक़्म देता तो, मैं औरतों को हुक़्म देता, कि वो अपने शौहर को सज़्दा करें।
शौहर के हक़ूक़ तो बहुत ज़्यादा है. इनमें से नीचे लिखे कुछ हक़ूक़ ज्यादा क़ाबिलें फर्ज है।
1. शौहर की इज़ाजत के बगैर घर से बाहर कहीं न जाये।
2. शौहर की गैर मौजूदगी में उसकी इज़ाजत के बगैर किसी को घर में आने नहीं दे, न कोई सामान उससे पुछे बगैर किसी को दे।
3. शौहर के मकान, माल और सामान की बीवी अमीन होती है, उसकी इज़ाजत के बगैर किसी को कुछ भी देना अमानत में खयानत है, जो एक बहुत बड़ा गुनाह हैं।
4. किसी भी स्थिति में ऐसा काम न करे जो शौहर को पसन्द न हो।
5. बच्चों की अच्छी तरबियत उनकी परवरिश उस पर फर्ज है।
6. मकान की हिफाज़त के साथ साफ सफाई का भी ख़ास ख्याल रखें।
7. हदीस में है कि अगर शौहर हुक्म दे की दिन भर धूप में खड़ी रहो, या रात भर जागती रहो तो बीवी पर फर्ज है कि वह उसके हुक्म की नाफरमानी नहीं करें। थोड़ी तकलीफ और सब्र के साथ उस पर अमल करे।
साथ में कुछ बातों का और ध्यान रखेः-
٭ शौहर की पसन्द, नापसन्द का ख्याल रखें। उसके उठने, बैठने, खाने-पीने, सोने-जागने, पहनने - ओढ़ने और बातचीत में उसकी आदत और हर बात को जान ले, उसके बाद लाज़िम है कि वह शौहर की आदतें पहचान लेने के बाद हर काम उसके अनुसार करे, चाहे उसका अमल उसका तरीका सही हो या गलत।
* अपने शौहर के माल, सामान, मकान आदि की कमिया नही निकालें.
* शौहर की शक्ल सूरत में खामियां नहीं ढूंढे।
* शौहर के मां-बाप, खानदान को कमेन्ट नहीं करें।
* शौहर की माली हालत के अनुसार खर्च करें।
* हमेशा शौहर के सामने उठते, बैठते या बातचीत में हर हालत में बाअदब रहे।
* शौहर की आमदनी या कमाई का हिसाब उससे न मांगे।
* अपने मां- बाप के, अपने परिवार की बड़ी बड़ी बातें उससे न करें।
* शौहर अगर किसी बात पर नाराज़ है तो उसे हर कीमत पर मनाये।

Wednesday, November 01, 2006

इस्लाम से पहले औरत


इस्लाम से पहले औरत का हाल बहुत खराब था। दुनिया में औरतों की कोई इज्ज़त नहीं थी। मर्दों के लिए उनकी नफसानी ख्वाहिश पुरी करने का खिलौना मात्र थी। मजदूरी करके जो कमाती थी वो भी मर्दों को देती थी।
जानवरों की तरह उनको मारते पीटते थे, छोटी छोटी बात पर उनके कान, नाक काट दिया करते थे, यहां तक कि कत्ल भी कर दिया करते थे।
लड़कियों को जिन्दा दफन कर दिया करते थे। बाप के मरने के बाद बेटे जायदाद के साथ बाप की बिवियों के भी मालिक बन जाया करते थे।
औरतों के बेवा हो जाने के बाद एक बन्द अन्धेरे कमरे में एक साल तक कैद करके रखते थे। एक साल तक खाना पानी के अलावा जरुरत की सारी चीज़े बंद कर देते।
बहुत सी औरतें तो घुटकर मर जाती थी। जो बच जाती थी उनके साथ ऐसे व्यवहार किये जाता थे कि औरतें रो रोकर, घुट घुटकर जिन्दगी गुजारती थी।
औरतों को शौहर की चिता के साथ ही जला दिया जाता था जिसे लोग 'सती' कहते थे।
समाज में न औरतों के कोई हक़ थे न उनकी फरियाद को कोई सुनने वाला था। रहमतुल आलमीन की रहमत का आफताब जब उजागर हुआ तो सारी दुनिया ने अचानक ये महसुस किया कि
जहां तारीक़ था, ज़ुलमातकदा था, सख्त काला था
कोई पर्दे से किया निकला के घर घऱ में उजाला था।

औरत इस्लाम के बाद

जब हमारे रसूल रहमत हज़रत मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाह अलैहेवसलम खुदा की तरफ से दीने इस्लाम लेकर तशरीफ लाए तो दुनिया भर की सताई हुई औरतों का सितारा चमक उठा और इस्लाम की बदौलत ज़ालिम मर्दों के जुल्म व सितम से निकलकर औरतों का दर्जा मर्दों की तरह उनके बराबर हो गया। औरतों के भी हक़ मुकरर्र हो गये।
उनके हक़ (अधिकार) दिलाने के लिए खुदा की तरफ से क़ानून आसमान से नाज़िल हो गये, अदालतें कायम हो गई, औरतें अपने रक़मों, अपनी तिजारती, अपनी जायदाद की मालिक बन गई।
अपने भाई, मां-बाप, शौहर, औलाद की जायदाद की मालिक बन गई। हर मर्द मज़हबी तौर पर औरतों के अधिकार अदा करने पर मजबूर है।
औरतों को इतनी बुलन्द मंजिलों पर पहुंचा देना, ये हमारे रसूल रहमत हज़रत मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाह अलैहेवसलम का एहसाने अज़ीम है

इस्लाम की नज़र में औरत क्या है

औरतः
खुदा की बड़ी से बड़ी नैमतों में से एक है।
दुनिया की आबादकारी और दिनदारी में मर्दों के बराबर शरीक है।
मर्द के दिल का सकुन, बदन का चैन, ज़हन का इत्मिनान, रुह की राहत है।
दुनिया के खुबसुरत चेहरों की एक आंख है, अगर औरत ना होती तो दुनिया की सुरत कानी होती।
आदम अलैहिस्सलाम व हज़रत हव्वा के सिवा तमाम इन्सानों की मां है, इसलिए वो सबके लिए काबिले एहतराम है।
औरत के बगैर मर्दों की ज़िन्दगी जंगली जानवर से बद्तर होती।
औरत बचपन में भाई - बहन से मुहब्बत करती है, शादी के बाद शोहर से मुहब्बत करती है, मां बनने के बाद बच्चों से मुहब्बत करती है, इसलिए औरत प्यार व मुहब्बत का ताज़ महल है।